
उजालों में वो छुपता है अंधेरों में वो बिखरा है
मिरी रातों का साथी है वो मेरा एक सपना है
न जाने कौन है वो शख्श मुझसे दूर रहकर भी
मिरे दिल में महकता है मेरी यादों में बसता है
उसे देखूँ तो मुझको चैन दिल को है सुकूँ आता
ये कैसा सिलसिला है रात-ओ-दिन मुझपे गुजरता है
उसे पाने की चाहत है उसे डर खोने का मुझको
ये कैसे दिल को समझाऊं वो जो उलझा सा बैठा है
न जाने कौन दिन होगा वो मेरे पास बैठेगा
मैं उस दिन तक जियूँगा क्या ये दिल गफलत में रहता है
मिरी जो एक दुनियाँ है मिरा ये एक गुलशन है
वो शबनम है मिरे गुलशन की जो गुल पर ही सोता है