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Pratidin Ek Kavita
Nayi Dhara Radio
1002 episodes
1 day ago
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Episodes (20/1002)
Pratidin Ek Kavita
Tumko Niharta Hun Subah Se | Dushyant Kumar

तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा।  दुष्यंत कुमार 


तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा,

अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा।


ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब,

फिरता है चाँदनी में कोई सच डरा-डरा।


पौधे झुलस गए हैं मगर एक बात है,

मेरी नज़र में अब भी चमन है हरा-भरा।


लंबी सुरंग-सी है तेरी ज़िंदगी तो बोल,

मैं जिस जगह खड़ा हूँ वहाँ है कोई सिरा।


माथे पे रखके हाथ बहुत सोचते हो तुम,

गंगा क़सम बताओ हमें क्या है माजरा।

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1 day ago
1 minute

Pratidin Ek Kavita
Mujh Se Pehle | Ahmad Faraz

मुझ से पहले। अहमद फ़राज़

मुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने
शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो
एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद
अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो
जज़ीरा: द्वीप

मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा
बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा: जो प्रेम का वादा करके भूल गया हो
खो चुका है जो किसी और की रानाई में
शायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल में
और कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में

मैं ने माना कि शब-ओ-रोज़ के हंगामों में
वक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता रफ़्ता
चाहे उम्मीद की शमएँ हों कि यादों के चराग़
मुस्तक़िल बोद बुझा देता है रफ़्ता रफ़्ता
शब-ओ-रोज़: रात-दिन; मुस्तक़िल: निरंतर; बोद : दूरी

फिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहे
मुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतीं
ज़ख़्म भर जाएँ मगर दाग़ तो रह जाता है
दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं
माज़ी: अतीत

ये भी मुमकिन है कि इक दिन वो पशेमाँ हो कर
तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले
तू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी है
उस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर ले
पशेमाँ: शर्मिंदा; ज़ूद-फ़रामोश: जल्दी भूलने वाला; ज़ूद-फ़रामोश: वादा तोड़ना

और मैं जिस ने तुझे अपना मसीहा समझा
एक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँ
जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैं
इसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ

अहद-ए-वफ़ा: प्रेम में दिया गया वचन

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2 days ago
2 minutes

Pratidin Ek Kavita
Chai Ke Pyale Mein | Rajkamal Chowdhary

चाय के प्याले में । राजकमल चौधरी


दुख करने का असली कारण है : पैसा


- पहले से कम चीज़ें ख़रीदता है।

कश्मीरी सेब दिल के मरीज़ को चाहिए


तो क्या हुआ? परिश्रम अब पहले से कम

पैसे ख़रीदता है। हम सबके लिए काम


इतना ही बचा है कि सुबह वक़्त पर शेव

कर सकें। शाम को घर में चाय, और


पड़ोसिनों के बारे में घरेलू कहानियाँ,

हज़ार छोटे दंगे-फ़साद होते हैं, इतिहास


और आर्थिक सभ्यता को उजागर करने

के लिए—एक बड़ी लड़ाई नहीं होती।


आदमी केले ख़रीदने में व्यस्त रहता है,

(और) बीते हुए, और नहीं बीते हुए


के बीच कड़ी बनकर एक छोटी-सी

मक्खी पड़ी रहती है, चाय के अधख़ाली


प्याले में!

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3 days ago
2 minutes

Pratidin Ek Kavita
Nukta-Chi Hai | Mirza Ghalib

नुक्ता-चीं है।  मिर्ज़ा ग़ालिब


नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने

क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने


मैं बुलाता तो हूँ उस को मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल

उस पे बन जाए कुछ ऐसी कि बिन आए न बने


खेल समझा है कहीं छोड़ न दे भूल न जाए

काश यूँ भी हो कि बिन मेरे सताए न बने


ग़ैर फिरता है लिए यूँ तिरे ख़त को कि अगर

कोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाए न बने


इस नज़ाकत का बुरा हो वो भले हैं तो क्या

हाथ आवें तो उन्हें हाथ लगाए न बने


कह सके कौन कि ये जल्वागरी किस की है

पर्दा छोड़ा है वो उस ने कि उठाए न बने


मौत की राह न देखूँ कि बिन आए न रहे

तुम को चाहूँ कि न आओ तो बुलाए न बने


बोझ वो सर से गिरा है कि उठाए न उठे

काम वो आन पड़ा है कि बनाए न बने


इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'

कि लगाए न लगे और बुझाए न बने


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4 days ago
2 minutes

Pratidin Ek Kavita
Agantuk | Agyeya

आगंतुक। अज्ञेय


आँखों ने देखा पर वाणी ने बखाना नहीं।


भावना ने छुआ पर मन ने पहचाना नहीं।

राह मैंने बहुत दिन देखी, तुम उस पर से आए भी, गए भी,


- कदाचित्, कई बार -

पर हुआ घर आना नहीं।


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5 days ago
1 minute

Pratidin Ek Kavita
Haar Na Apni Manunga Main | Gopaldas Neeraj

हार न अपनी मानूँगा मैं !। गोपालदास "नीरज"


चाहे पथ में शूल बिछाओ

चाहे ज्वालामुखी बसाओ,

किन्तु मुझे जब जाना ही है -

तलवारों की धारों पर भी, हँस कर पैर बढ़ा लूँगा मैं !

 

मन में मरू-सी प्यास जगाओ,

रस की बूँद नहीं बरसाओ,

किन्तु मुझे जब जीना ही है -

मसल-मसल कर उर के छाले, अपनी प्यास बुझा लूँगा मैं !


हार न अपनी मानूंगा मैं !

 

चाहे चिर गायन सो जाए,

और ह्रदय मुर्दा हो जाए,

किन्तु मुझे अब जीना ही है -

बैठ चिता की छाती पर भी, मादक गीत सुना लूँगा मैं !


हार न अपनी मानूंगा मैं !

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6 days ago
1 minute

Pratidin Ek Kavita
Tumhari Aankhein | Parag Pawan

तुम्हारी आँखें।पराग पावन 


कितनी सुंदर हैं तुम्हारी आँखें 

मुझे कुछ और चाहिए 

जो कहा न गया हो आँखों के बारे में 

इतनी सुंदर आँखों से 

कितनी सुंदर दुनिया दिखती होगी 

और तुम्हारा काजल 

ओह जैसे पानी पर पानी बरसता है 

अपनी ही उछाल 

को उत्सव में बदलते हुए

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1 week ago
1 minute

Pratidin Ek Kavita
Cheekho Dost | Pratibha Katiyar

चीख़ो दोस्त - प्रतिभा कटियार


चीख़ो दोस्त

कि इन हालात में


अब चुप रहना गुनाह है

और चुप भी रहो दोस्त


कि लड़ने के वक़्त में

महज़ बात करना गुनाह है


फट जाने दो गले की नसें

अपनी चीख़ से


कि जीने की आख़िरी उम्मीद भी

जब उधड़ रही हो


तब गले की इन नसों का

साबुत बच जाना गुनाह है


चलो दोस्त

कि सफ़र लंबा है बहुत


ठहरना गुनाह है

लेकिन कहीं न जाते हों जो रास्ते


उन रास्तों पर  बेसबब चलते  जाना

भी तो गुनाह है


हँसो दोस्त

उन निरंकुश होती सत्ताओं पर


जो अपनी घेरेबंदी में घेरकर, गुमराह करके


हमारे ही हाथों हमारी तक़दीरों पर

लगवा देते हैं ताले


कि उनकी कोशिशों पर

निर्विकार रहना गुनाह है


और रो लो दोस्त कि

बेवजह ज़िंदगी से महरूम कर दिए गए लोगों के


लिए न रोना भी गुनाह है

मर जाओ दोस्त कि


तुम्हारे जीने से

जब फ़र्क़ ही न पड़ता हो दुनिया को


तो जीना गुनाह है

और जियो दोस्त कि


बिना कुछ किए

यूँ ही


मर जाना गुनाह है...


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1 week ago
2 minutes

Pratidin Ek Kavita
Agnipath | Harivansh Rai Bachchan

अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!। हरिवंशराय बच्चन


अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

वृक्ष हों भलें खड़े,


हों घने, हों बड़ें,

एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत!


अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

तू न थकेगा कभी!


तू न थमेगा कभी!

तू न मुड़ेगा कभी!—कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!


अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

यह महान दृश्य है—


चल रहा मनुष्य है

अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!


अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!


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1 week ago
1 minute

Pratidin Ek Kavita
Jo Shilayein Todte Hain | Kedarnath Aggarwal

जो शिलाएँ तोड़ते हैं । केदारनाथ अग्रवाल


ज़िंदगी को


वह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं,

जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं।


यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के

श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!


ज़िंदगी को

वे गढ़ेंगे जो खदानें खोदते हैं,


लौह के सोए असुर को कर्म-रथ में जोतते हैं।

यज्ञ को इस शक्ति श्रम के


श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!

ज़िंदगी को


वे गढ़ेंगे जो प्रभंजन हाँकते हैं,

शूरवीरों के चरण से रक्त-रेखा आँकते हैं।


यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के

श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!


ज़िंदगी को

वे गढ़ेंगे जो प्रलय को रोकते हैं,


रक्त से रंजित धरा पर शांति का पथ खोजते हैं।

यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के


श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!

मैं नया इंसान हूँ इस यज्ञ में सहयोग दूँगा।


ख़ूबसूरत ज़िंदगी की नौजवानी भोग लूँगा।


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1 week ago
2 minutes

Pratidin Ek Kavita
Ek Bijooke Ki Prem Kahani | Anamika

एक बिजूके की प्रेम कहानी | अनामिका 


मैं हूँ बिजूका 

एक ऐसे खेत का

जिसमें सालों से कुछ नहीं उगा

बेकार पड़ा पड़ा धसक गया है मेरा 

हाड़ी सा गोल गोल माथा, उखड़ गई हैं मूँछें लचक गए हैं कंधे

एक तरफ़ झूल गया है कुर्ता 

कुर्ते की जेबी में चुटुर- पुटुर करती है लेकिन 

नीले पीले पंखों वाली इक छोटी-सी चिड़िया

एक वक़्त था जब यह चिड़िया मुझ से बहुत डरती थी


धीरे-धीरे उसका डर निकल गया

कल मेरी जेबी में अंडे दिए उसने 

मेरे भरोसे ही उन्हें छोड़ कर जाती है वह दाना लाने

बहुत दूर

नया नया है मेरी ख़ातिर भरोसे का कोमल एहसास

काठ के कलेजे में मेरे बजने लगा है इकतारा

दूर तलक है उजाड़ मगर यह जो चटकने चमकने लगी है बूटी भरोसे की


उसकी ही मूक प्रार्थना फूली है शायद कि बदलियाँ उमड़ आई हैं अचानक

खिल जाएंगी बूटियाँ अब तो

बस जाएगा फिर से यह उजड़ा दयार

लेकिन जब खेत हरे हो जाएँगे

मुझको फिर से भयावह बना देंगे खेतों के मालिक

हाड़ी मुख पर मेरे कोलतार पोतेंगे

लाल नेल पॉलिश से आँखें बनाएँगी ख़ून टपकती हुई, मक्के के मूंछों पर लस्सा लगाकर मुझे बनाएंगे ख़ूब कड़क 

ढह जाएगी तब तो मेरी निरीहता 

जब मैं भयावह हो जाऊंगा फिर से 

डर जाएगी मेरी चिड़िया मुझी से 

और दूर उड़ जाएगी सदा के लिए 

क्या बेबसी प्यार का घर है

प्यार हमदर्द नगर है?

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1 week ago
4 minutes

Pratidin Ek Kavita
Champa Kale Kale Acchar Nahi Cheenti | Trilochan

चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती । त्रिलोचन


चंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती

मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है


खड़ी-खड़ी चुपचाप सुना करती है

उसे बड़ा अचरज होता है :


इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर

निकला करते हैं


चंपा सुंदर की लड़की है

सुंदर ग्वाला है : गायें-भैंसे रखता है


चंपा चौपायों को लेकर

चरवाही करने जाती है


चंपा अच्छी है

चंचल है


न ट ख ट भी है

कभी-कभी ऊधम करती है


कभी-कभी वह क़लम चुरा देती है

जैसे तैसे उसे ढूँढ़ कर जब लाता हूँ


पाता हूँ—अब काग़ज़ ग़ायब

परेशान फिर हो जाता हूँ


चंपा कहती है :

तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर


क्या यह काम बहुत अच्छा है

यह सुनकर मैं हँस देता हूँ


फिर चंपा चुप हो जाती है

उस दिन चंपा आई, मैंने कहा कि


चंपा, तुम भी पढ़ लो

हारे गाढ़े काम सरेगा


गांधी बाबा की इच्छा है—

सब जन पढ़ना-लिखना सीखें


चंपा ने यह कहा कि

मैं तो नहीं पढ़ूँगी


तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं

वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे


मैं तो नहीं पढ़ूँगी

मैंने कहा कि चंपा, पढ़ लेना अच्छा है


ब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी,

कुछ दिन बालम संग साथ रह चला जाएगा जब कलकत्ता


बड़ी दूर है वह कलकत्ता

कैसे उसे सँदेसा दोगी


कैसे उसके पत्र पढ़ोगी

चंपा पढ़ लेना अच्छा है!


चंपा बोली : तुम कितने झूठे हो, देखा,

हाय राम, तुम पढ़ लिखकर इतने झूठे हो


मैं तो ब्याह कभी न करूँगी

और कहीं जो ब्याह हो गया


तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूँगी

कलकत्ता मैं कभी न जाने दूँगी


कलकत्ते पर बजर गिरे।


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1 week ago
3 minutes

Pratidin Ek Kavita
Dil Mein Hardam Chubhne Wala | Madhav Kaushik

दिल में हर दम चुभने वाला ।  माधव कौशिक

 

दिल में हर दम चुभने वाला काँटा सही सलामत दे

आँखें दे या मत दे लेकिन सपना सही सलामत दे


हमें तो युद्ध आतंक भूख से मारी धरती बख़्शी है

आने वाली पीढ़ी को तो दुनिया सही सलामत दे


दावा है मैं  इक दिन  उस को दरिया कर के छोड़ूँगा

खुली हथेली पर आँसू का क़तरा सही सलामत दे


बच्चे भी अब खेल रहे हैं ख़तरनाक हथियारों से

बचपन की बग़िया को कोई गुड़िया सही सलामत दे


आधी और अधूरी हसरत कब तक ज़िंदा रक्खेंगे

काग़ज़ पर ही दे लेकिन घर का नक़्शा सही सलामत दे


भीड़ भरी महफ़िल में सबकी अलग अलग पहचान तो हो 

इसीलिए हर एक इंसान को चेहरा सही सलामत दे 


दिल में हर दम चुभने वाला काँटा सही सलामत दे

आँखें दे या मत दे लेकिन सपना सही सलामत दे


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1 week ago
4 minutes

Pratidin Ek Kavita
Itni Si Azadi | Rupam Mishra

इतनी सी आज़ादी । रूपम मिश्र


चाहती हूँ जब घर-दुवार के सब कामों से छूटूँ तो हर साँझ तुम्हें फोन करूँ

तुमसे बातें करूँ  देश - दुनिया की 

सेवार- जवार बदलने और न बदलने की 

पेड़ पौधों के नाम से जानी जाती जगहों की 

 

तुमसे ही शोक कर लेती उस दुःख का कि पाट दिए गये गाँव के सभी कुवें ,गड़हे साथी 


और ढेरवातर पर अब कोई ढेरा का पेड़ नहीं है  

अब तो चीन्ह में भी नहीं बची बसऊ के बाग और मालदहवा की अमराई की 

राह में चाहकर भी अब कोई नहीं छहाँता

 मौजे, पुरवे विरान लगते हैं 

 उनका हेल-मेल अब बस सुधियों में बचा है

नाली और रास्ते को लेकर मचे गंवई रेन्हे की


अबकी खूब सऊखे अनार के फूलों की 

तितलियाँ कभी -कभी आँगन में भी आ जाती हैं इस अचरज की


गिलहरी , फुदगुईया और एक जोड़ा बुलबुल आँगन में रोज़ आते हैं कपड़े डालने का तार उनका प्रिय अड्डा है

कुछ नहीं तो जैसे ये कि आज बड़ा चटक घाम हुआ था

और कल अंजोरिया बताशे जैसी छिटकी थी 

तुममें ही नहीं समाती तुम्हारी हँसी की  

 या अपने मिठाई-प्रेम की 

 तुम्हारे बढ़ते ही जा रहे वजन की

 जिसकी झूठी चिंता तुम मुझसे गाहे-बगाहे करते रहते हो

और बताती कि नहीं होते हमारे घरों में ऐसे बुजुर्ग कि दिल टूटने पर जिनकी गोद में सिर डाल कर रोया जा सके 

और जीवन में घटे प्रेम से इंस्टाग्राम पर हुए प्रेम का ताप ज़रा भी कम नहीं होता साथी , इस सच की 


याद दिलाती तुम्हें कार्तिक में जुते खेतों के सौंदर्य की 

अभिसरित माटी में उतरे पियरहूँ रंग की


और बार - बार तुमसे पूछती तुम्हें याद है धरती पर फूल खिलने के दिन आ गये हैं  


इतना ही मिलना हमारे लिए बड़ा सुख होता 

इतनी सी आज़ादी के लिए हम तरसते हैं 

और सब कहते हैं अब और कितनी आज़ादी चाहिए ।


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2 weeks ago
3 minutes

Pratidin Ek Kavita
Apna Abhinay Itna Accha Karta Hun | Naveen Sagar

अपना अभिनय इतना अच्छा करता हूँ । नवीन सागर


घर से बाहर निकला


फिर अपने बाहर निकल कर

अपने पीछे-पीछे चलने लगा


पीछे मैं इतने फ़ासले पर छूटता रहा

कि ओझल होने से पहले दिख जाता था


एक दिन

घर लौटने के रास्ते में ओझल हो गया


ओझल के पीछे कहाँ जाता

घर लौट आया


दीवारें धुँधली पड़ कर झुक-सी गईं

सीढ़ियाँ नीचे से ऊपर


ऊपर से नीचे होने लगीं

पर वह घर नहीं लौटा


घर से बाहर निकला

फिर मुझसे बाहर निकल कर चला गया


मैं आईने में देखता हूँ

वह आईने में से मुझे नहीं देखता


मैं बार-बार लौटता हूँ

पर वह नहीं लौटता


घर में किसी को शक नहीं है

मूक चीज़ें जानती हैं पर मुझसे पूछती नहीं हैं


कि वह

कहाँ गया और तुम कौन हो!


अपना अभिनय इतना अच्छा करता हूँ

कि हूबहू लगता हूँ


दरवाज़े खुल जाते हैं -

नींद के नीम अँधेरे चलचित्र में जागा हुआ


सूने बिस्तर पर सोता हूँ।


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2 weeks ago
2 minutes

Pratidin Ek Kavita
Kona | Priya Johri 'Muktipriya'

कोना । प्रिया जोहरी 'मुक्तिप्रिया’


वो

कोना था

मेरे जीवन का,

एक गहरा,

सकरा,

फिर भी विस्तृत-

इतना कि उसमें

पूरा जीवन समा जाए।

समा जाएँ

मेरी हर तकलीफ,

हर रंज,

हर तंज।

उस कोने में बैठकर

लिख सकती हूँ

अनगिनत प्रेम-पत्र,

पढ़ सकती हूँ


मन की दो किताबें,

तोड़ सकती हूँ


कई गुलाब,


और गूँथ सकती हूँ

एक फूलों की माला।

महसूस कर सकती हूँ

नदी का तेज,

ताज़ी हवा का हर झोंका।

देख सकती हूँ.

हथेली पर रखा

एक सफेद मोती,

जो किसी चमत्कार सा

चमकता है।

सजा सकती हूँ

बालों में

गुलमोहर की लट,

महक सकती हूँ

एक अनछुई

खुशबू सी।

खिल सकती हूँ

यूँ जैसे

अभी-अभी

कोई ताज़ा कमल

खिला हो।

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2 weeks ago
1 minute

Pratidin Ek Kavita
Theek Hai Khud Ko Hum Badalte Hain | Jaun Elia

ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं। जौन एलिया


ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं


शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं

हो रहा हूँ मैं किस तरह बरबाद


देखने वाले हाथ मलते हैं

है वो जान अब हर एक महफ़िल की


हम भी अब घर से कम निकलते हैं

क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में


जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं

है उसे दूर का सफ़र दर-पेश


हम सँभाले नहीं सँभलते हैं

तुम बनो रंग तुम बनो ख़ुश्बू


हम तो अपने सुख़न में ढलते हैं

मैं उसी तरह तो बहलता हूँ


और सब जिस तरह बहलते हैं

है अजब फ़ैसले का सहरा भी


चल न पड़िए तो पाँव जलते हैं


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2 weeks ago
2 minutes

Pratidin Ek Kavita
Log Pagdandiyan Banayenge | Lakshmishankar Vajpeyi

लोग पगडंडियाँ बनाएँगें। लक्ष्मीशंकर वाजपेयी

 

रास्ते जब नज़र न आएँगे

लोग पगडंडियाँ बनाएँगे।


खुश न हो कर्ज़ के उजालों से

ये अँधेरे भी साथ लाएँगे।


ख़ौफ़ सारे ग्रहों पे है कि वहाँ

आदमी बस्तियाँ बसाएँगे।


सुनते-सुनते गुज़र गई सदियाँ

मुल्क़ से अब अँधेरे जाएँगे।


जीत डालेंगे सारी दुनिया को

वे जो अपने को जीत पाएँगे।


दूध बेशक पिलाएँ साँपों को

उनसे लेकिन ज़हर ही पाएँगे।

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2 weeks ago
2 minutes

Pratidin Ek Kavita
Jeevan Ki Jai | Maithlisharan Gupt

जीवन की जय। मैथिलीशरण गुप्त


मृषा मृत्यु का भय है,


जीवन की ही जय है।

जीवन ही जड़ जमा रहा है,


निज नव वैभव कमा रहा है,

पिता-पुत्र में समा रहा है,


यह आत्मा अक्षय है,

जीवन की ही जय है!


नया जन्म ही जग पाता है,

मरण मूढ़-सा रह जाता है,


एक बीज सौ उपजाता है,

स्रष्टा बड़ा सदय है,


जीवन की ही जय है।

जीवन पर सौ बार मरूँ मैं,


क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं,

यदि न उचित उपयोग करूँ मैं,


तो फिर महा प्रलय है,

जीवन की ही जय है।


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2 weeks ago
2 minutes

Pratidin Ek Kavita
Prayashchit | Hemant Deolekar

प्रायश्चित । हेमंत देवलेकर


इस दुनिया में

आने-जाने के लिए

अगर एक ही रास्ता होता

और नज़र चुराकर

बच निकलने के हज़ार रास्ते

हम निकाल नहीं पाते

तो वही एकमात्र रास्ता

हमारा प्रायश्चित होता

और ज़िन्दगी में लौटने का

नैतिक साहस भी


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2 weeks ago
1 minute

Pratidin Ek Kavita
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।