यह अध्याय शिव पुराण के उस अत्यंत भावपूर्ण प्रसंग का वर्णन करता है जहाँ देवी पार्वती भगवान शिव की कठोर तपस्या, सेवा और भक्ति द्वारा उनके हृदय को जीत लेती हैं।
देवताओं के कल्याण हेतु पार्वती-शिव का दिव्य संयोग आवश्यक था, क्योंकि तारकासुर के वध के लिए शिव के तेजस्वी पुत्र का जन्म होना था।
इस अध्याय में पार्वती की निष्ठा, कामदेव का भस्म होना, शिव की समाधि, और अंततः देवी पार्वती की तपस्या की सिद्धि का अत्यंत प्रेरणादायक वर्णन मिलता है। यह कथा भक्ति, त्याग, धैर्य और शिव-शक्ति के दिव्य रहस्य को प्रकट करती है।
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बारहवें अध्याय में हिमालय द्वारा भगवान शिव को पार्वती की सेवा के लिए मनाने की पवित्र कथा सुनाई गई है।
इस प्रसंग में हिमालय का भक्तिभाव, शिवजी की तपस्या, और पार्वती की महाशक्ति का गूढ़ स्वरूप उजागर होता है।
कथा बताती है कि क्यों शिवजी तपस्वियों के लिए स्त्री–संग को बाधक मानते हैं, और कैसे हिमालय अपने दलित हृदय से शिवजी से विनती करते हैं। यह अध्याय भक्ति, तप, विरक्ति, शिव–पार्वती संबंधों और हिमालय के उच्च आदर्शों का दिव्य समन्वय प्रस्तुत करता है।
शिव पुराण की इस अद्भुत कथा में दिव्य ज्ञान, धर्म, तपस्या और शिव–भक्ति का अद्वितीय संगम है।
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भगवान शिव की गंगावतरण तीर्थ में तपस्या से जुड़ी इस पवित्र कथा में हिमालय पुत्री पार्वती, गिरिराज हिमालय और देवाधिदेव महादेव के दिव्य मिलन का अद्भुत वर्णन मिलता है।
जब महादेव ने पार्वती के जन्म का समाचार सुना, तब उन्होंने गंगोत्री के पावन स्थल पर एकांत में कठोर तप करने का निश्चय किया।
इस अध्याय में शिवजी की एकाग्रचित्त साधना, हिमालय द्वारा की गई भक्ति-पूजा, देवताओं की उपस्थितियाँ और गंगा के उद्गम स्थान का महात्म्य स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है। यह कथा न केवल शिव-भक्ति की महानता दर्शाती है, बल्कि पार्वती के भविष्य में होने वाले शुभ विवाह की नींव भी रखती है।
गंगा, तपस्या, हिमालय और शिव की साधना—इन सभी का आध्यात्मिक संगम इस अध्याय को अत्यंत पावन और प्रेरणादायी बनाता है।
भगवान शिव की तपस्या
गंगावतरण कथा
हिमालय और शिव संवाद
शिव पार्वती की कथा
गंगा उद्गम स्थल
गंगोत्री की पौराणिक कथा
शिव पुराण अध्याय
देवाधिदेव महादेव
पार्वती जन्म कथा
शिव तपस्या वर्णन
गंगा का महत्व
“शिव पुराण के दसवें अध्याय ‘भोम्-जन्म’ में वर्णित कथा भगवान शिव के तप, समाधि, सती-वियोग, दिव्य शिशु ‘भोम्’ के जन्म और पृथ्वी माता द्वारा उसके पालन-पोषण की अद्भुत लीला को प्रकट करती है।
इस अध्याय में शिव के अत्यंत पावन यश, उनके ध्यान, असंख्य वर्षों की समाधि, उनके मस्तक से गिरे पसीने से बालक भोम् का प्रकट होना और फिर उस दिव्य बालक का काशी जाकर कठोर तपस्या से भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का वर्णन है।
यह कथा शिव-भक्तों, पुराण प्रेमियों, हिंदू धर्मग्रंथों के पाठकों और अध्यात्म में रुचि रखने वालों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है। भोम्-जन्म अध्याय शिव की करुणा, शक्ति और अनंत लीला का अनूठा उदाहरण है।”
भोम् जन्म कथा
शिव पुराण दसवां अध्याय
भोम् का जन्म कैसे हुआ
भगवान शिव और भोम्
शिव पुराण कथा हिंदी में
सती-वियोग के बाद शिव की कथा
शिव की समाधि की कहानी
पृथ्वी माता और भोम्
शिव के पसीने से जन्मा बालक
भोम् की तपस्या और काशी
भोम् दिव्यलोक कथा
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“नवां अध्याय — पार्वती का स्वप्न” शिव पुराण का अत्यंत पवित्र अध्याय है, जिसमें देवी पार्वती के दिव्य जन्म, उनके भविष्य के संकेत, भगवान शिव से विवाह के पूर्व के शुभ स्वप्न और माता मैना-हिमालय की भावनाओं का दिव्य वर्णन मिलता है। इस अध्याय में बताया गया है कि देवी पार्वती को ब्रह्ममुहूर्त में एक अद्भुत स्वप्न प्राप्त होता है जिसमें एक तपस्वी ब्राह्मण (भगवान शिव का ही स्वरूप) उन्हें उनके भविष्य—‘शिवप्राणवल्लभा’ बनने का वरदान देते हैं। माता मैना और राजा हिमालय अपने-अपने स्वप्नों की व्याख्या एक-दूसरे से साझा करते हैं और पार्वती को शिव की तपस्या करने के लिए प्रेरित करते हैं। यह अध्याय शिव-पार्वती प्रेम, भक्ति, तपस्या और दिव्य भविष्यवाणी को उजागर करता है। शिव पुराण पढ़ने वालों, भक्तों, अध्यात्म प्रेमियों और पुराणकथाओं के शोधकर्ताओं के लिए यह अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक है।
पार्वती का स्वप्न कथा
शिव पुराण नवां अध्याय
पार्वती का सपना शिव पुराण
माता पार्वती की तपस्या
भगवान शिव पार्वती विवाह कथा
मैना हिमालय संवाद
शिव पार्वती प्रेम कथा
शिवपुराण पार्वती अध्याय
ब्रह्ममुहूर्त स्वप्न कथा
देवी पार्वती जन्म और तपस्या
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“शिव पुराण” के आठवें अध्याय में माता मैना और हिमालय के बीच हुआ दिव्य संवाद दर्शाया गया है, जिसमें माता मैना अपनी पुत्री पार्वती के भविष्य और विवाह को लेकर चिंतित होती हैं।
देवर्षि नारद की बातों को याद करते हुए वे हिमालय से पार्वती के लिए एक सुयोग्य, शुभ लक्षणों वाले वर की खोज करने का आग्रह करती हैं।
हिमालय उन्हें सांत्वना देते हुए बताते हैं कि यदि पार्वती को सच्चा सुख पाना है, तो उन्हें भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए तपस्या करनी होगी। वे समझाते हैं कि भगवान शंकर सदैव कल्याणकारी हैं, और यदि वे प्रसन्न हो जाएं तो स्वयं पार्वती का पाणिग्रहण करेंगे।
यह अध्याय भक्ति, तपस्या, मातृत्व, दिव्य भाग्य और शंकर-पार्वती के पवित्र मिलन की भूमिका को अत्यंत सुंदर रूप से प्रकट करता है।
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शिव पुराण का यह अध्याय देवी पार्वती के जन्म, नामकरण और भगवान शिव से उनके दिव्य संबंध की कथा को विस्तारपूर्वक वर्णित करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे देवी जगदंबिका ने हिमालय और मैना के घर जन्म लेकर पार्वती के रूप में अवतार लिया।
बाल्यकाल में पार्वती अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और गुणों से युक्त थीं, जिससे हिमालय और मैना अत्यंत प्रसन्न थे। नारद मुनि ने हिमालय को भविष्यवाणी दी कि पार्वती का विवाह स्वयं भगवान शिव से होगा। इस कथा में सती के पुनर्जन्म की दिव्य लीला का भी उल्लेख है, जिसमें पार्वती को अपने पूर्व जन्म की स्मृति प्राप्त होती है।
भगवान शिव और पार्वती का प्रेम अलौकिक, शाश्वत और ब्रह्मांड के संतुलन का प्रतीक बताया गया है। नारद मुनि के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि सच्चा प्रेम और तपस्या ही ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग है। यह अध्याय शिव-पार्वती के पुनर्मिलन की कथा के रूप में भक्ति, प्रेम और त्याग का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
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“शिव पुराण – छठा अध्याय: पार्वती जन्म” में वर्णन है कि किस प्रकार देवी जगदंबा ने हिमालय और मैना के घर जन्म लेकर माता पार्वती का दिव्य अवतार धारण किया।
भगवती ने पहले हिमालय के हृदय में प्रवेश किया और फिर मैना के गर्भ से जन्म लिया। उनके जन्म के समय पूरा ब्रह्मांड प्रकाशमय हो गया — मंद-मंद हवा चलने लगी, पुष्पवृष्टि होने लगी और सभी देवता हिमालय के घर दर्शन हेतु आए।
देवी ने अपने दिव्य स्वरूप में माता मैना को दर्शन दिए और कहा — “मैं पृथ्वी पर भगवान शिव को पुनः अपना पति बनाऊंगी और जगत का उद्धार करूंगी।”
यह अध्याय माँ पार्वती के जन्म, उनके दिव्य रूप, तथा उनके भविष्य के उद्देश्य की कथा का विस्तार से वर्णन करता है — जिसमें भक्ति, मातृत्व और सृष्टि के संतुलन का अद्भुत संगम है।
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शिव पुराण के श्रीरुद्र संहिता के पाँचवें अध्याय में हिमालय और उनकी पत्नी मैना की अद्भुत तपस्या का वर्णन मिलता है। जब देवी सती ने अपने शरीर का त्याग किया और जगदंबा अंतर्धान हुईं, तब श्रीहरि विष्णु ने हिमालय और मैना को देवी जगदंबा की आराधना करने का उपदेश दिया।
दोनों ने सताईस वर्षों तक कठोर तप किया — चैत्रमास से प्रारंभ होकर नवमी और अमावस्या को व्रत, पूजा, दान और ब्राह्मण सेवा के माध्यम से उन्होंने देवी दुर्गा को प्रसन्न किया।
उनकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर देवी जगदंबा स्वयं प्रकट हुईं और उन्हें वरदान दिया कि वे उनके घर पुत्री रूप में जन्म लेंगी — वही पुत्री आगे चलकर पार्वती बनीं, जो शिवजी की अर्धांगिनी बनीं।
यह अध्याय शक्ति की कृपा, भक्ति की गहराई और तप के फल का जीवंत उदाहरण है।
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शिव पुराण के श्रीरुद्र संहिता के इस अध्याय में बताया गया है कि जब सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सहन न कर योगाग्नि द्वारा अपना शरीर त्याग दिया, तब समस्त देवता विष्णु जी के साथ हिमालय के पास पहुँचे। उन्होंने हिमालय से प्रार्थना की कि देवी सती पुनः उनके घर जन्म लें और भगवान शिव की अर्धांगिनी बनें। श्रीविष्णु के वचनों से हिमालय अत्यंत प्रसन्न हुए और देवी जगदंबा की आराधना की।
इस प्रसंग में देवताओं द्वारा की गई जगदंबा उमा की भव्य स्तुति का वर्णन मिलता है — जिसमें उन्हें गायत्री, सावित्री, सरस्वती, लक्ष्मी और वेदों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में संबोधित किया गया है।
यह अध्याय दर्शाता है कि देवी सती का पुनर्जन्म पार्वती के रूप में हुआ और कैसे उनके तप, भक्ति और शिव के प्रति अटूट प्रेम ने सम्पूर्ण सृष्टि को पुनः संतुलन प्रदान किया। यह कथा भक्ति, त्याग और शक्ति के दिव्य संगम की प्रतीक है।
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शिव पुराण के श्रीरुद्र संहिता तृतीय खंड के इस अध्याय में बताया गया है कि पितरों की तीन कन्याएँ — मैना, धन्या और कालावती — शाप से मुक्त होकर पुनः अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त करती हैं। मैना की पुत्री पार्वती कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव की प्राणवल्लभा बनती हैं, धन्या की पुत्री सीता श्रीरामचंद्र की पत्नी बनती हैं, और कालावती की पुत्री राधा श्रीकृष्ण के स्नेह में बंधकर उनकी प्रिया बनती हैं। यह कथा शिव पुराण में भगवती पार्वती के जन्म, तपस्या और दिव्य मिलन की पवित्र भूमिका को उजागर करती है। जो भी इस कथा को श्रद्धा-भाव से पढ़ता या सुनता है, उसे मोक्ष, यश, आयु और पुण्य की प्राप्ति होती है।
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“शिव पुराण – श्रीरुद्र संहिता” के इस प्रथम अध्याय हिमालय विवाह में बताया गया है कि देवी सती, जिन्होंने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में शरीर त्याग किया था, पुनर्जन्म लेकर हिमवान पर्वत की पुत्री ‘मैना’ के रूप में जन्मीं। यह अध्याय इस दिव्य कथा का आरंभ है, जिसमें ब्रह्माजी नारद मुनि के प्रश्नों का उत्तर देते हुए हिमालय पर्वत की महिमा, उसकी पवित्रता, और देवताओं के आगमन का सुंदर वर्णन करते हैं।
देवताओं और पितरों के संवाद में यह निर्णय होता है कि हिमवान का विवाह मैना से होना चाहिए — जो मंगल स्वरूपिणी हैं और जिनका यह दिव्य मिलन भविष्य में देवी पार्वती के जन्म का कारण बनेगा। विवाह उत्सव का अद्भुत वर्णन इस अध्याय में किया गया है, जिसमें सभी देवी-देवता, स्वयं श्रीहरि विष्णु सहित, इस शुभ अवसर के साक्षी बनते हैं।
यह कथा न केवल हिमालय की पवित्रता का गुणगान करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि शिव–सती के प्रेम का पुनर्जन्म किस प्रकार होने वाला है। जो व्यक्ति इस कथा को श्रद्धाभाव से सुनता या पढ़ता है, उसे धर्म, ज्ञान और शांति की प्राप्ति होती है।
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शिव पुराण के सती खंड में देवी सती और भगवान शिव की दिव्य कथा का वर्णन है। इसमें दक्ष यज्ञ, देवी सती का आत्मत्याग, भगवान शिव का क्रोध, वीरभद्र का प्रकट होना और अंततः दक्ष का पुनर्जीवन शामिल है। यह कथा भक्तों को भक्ति, धैर्य और शिव कृपा की अद्भुत महिमा का अनुभव कराती है। इस अध्याय का पाठ करने से पापों से मुक्ति, यश, स्वर्ग और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।"
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शिव द्वारा दक्ष को पुनर्जीवित करने का अध्याय - इस अध्याय में भगवान शिव की करुणा और क्षमा की लीला का अद्भुत वर्णन है। दक्ष के यज्ञ-विध्वंस और उसके परिणामस्वरूप हुए विनाश के बाद सभी देवता, ऋषि-मुनि और विष्णु भगवान शिव से क्षमा और कृपा की याचना करते हैं। भगवान शिव प्रसन्न होकर यज्ञ को पूर्ण करते हैं, देवताओं के घावों को भरते हैं और दक्ष को जीवनदान देते हैं। यह कथा क्षमा, करुणा और पुनरुत्थान का गहरा संदेश देती है।
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शिव पुराण के इस अध्याय में देवता और ऋषि-मुनि भगवान शिव के क्रोध को शांत करने के लिए विनम्रता से क्षमा याचना करते हैं। यह कथा दिखाती है कि केवल भगवान शिव की कृपा से ही विनाश से रक्षा संभव है।
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शिव पुराण श्रीरुद्र संहिता के उनचालीसवें अध्याय में दधीचि ऋषि और क्षुव के विवाद, भगवान विष्णु की लीला तथा महर्षि दधीचि के शाप का अद्भुत प्रसंग मिलता है। इस कथा के श्रवण से अपमृत्यु का भय मिटता है, युद्ध में विजयश्री की प्राप्ति होती है और अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
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शिव पुराण श्रीरुद्र संहिता द्वितीय खंड के अड़तीसवें अध्याय में दधीचि और क्षुव के बीच विवाद का वर्णन है। इस कथा में अहंकार, श्राप, भगवान शिव की महिमा और महामृत्युंजय मंत्र की दिव्य शक्ति का गहन वर्णन मिलता है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि शिव की भक्ति और तपस्या से ही मोक्ष और कल्याण संभव है।
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शिव पुराण श्रीरुद्र संहिता – द्वितीय खंड का सैंतीसवां अध्याय दक्ष प्रजापति के अंत का वर्णन करता है। वीरभद्र ने यज्ञशाला में घुसकर सभी देवताओं को परास्त किया और अंत में दक्ष का सिर काटकर यज्ञ कुंड में डाल दिया। यह प्रसंग शिवजी के अपमान और सती माता के त्याग के परिणामस्वरूप दक्ष के विनाश की कथा है।
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शिव पुराण श्रीरुद्र संहिता – द्वितीय खंड, छत्तीसवाँ अध्याय
इस अध्याय में श्रीहरि विष्णु और वीरभद्र के बीच हुए भयानक युद्ध का वर्णन है। शिवजी के अपमान और देवी सती के अन्याय के कारण उत्पन्न यह संग्राम देवताओं और ऋषियों के लिए भयावह सिद्ध हुआ।
वीरभद्र और महाकाली ने अनेक देवताओं और मुनियों को दंडित किया तथा उनकी करनी के अनुसार उन्हें परिणाम भोगना पड़ा। यह अध्याय हमें सिखाता है कि शिव और सती का अपमान करने का परिणाम कितना गंभीर हो सकता है।
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