https://youtu.be/6xxWaTuuAIc कीर्ति मारे उत्सुकता के फिर खड़ी हो गई. यह पाँचवी मरतबा था, लेकिन इस बार लगा कि सीटी की आवाज सचमुच दूर से काफी नजदीक होती आ रही है और गाड़ी प्लेटफार्म में प्रवेश करे, इसमें अधिक देर नहीं...
घबराहट से चेहरे का पसीना पोंछने के लिए उसने रूमाल टटोला. नहीं था. बेंच पर छूटने की भी कोई संभावना नहीं थी. जल्दी-जल्दी यही होता है, उसने सोचा. वह साड़ी से ही मुँह पोंछना चाहती थी, लेकिन तभी यक-ब-यक सारे प्लेटफार्म में मुसाफिरों तथा सामान लदे कुलियों की भगदड़ मच गई -
'हेलो!' सहसा उसी समय अपने कंधे पर पड़े स्पर्श से कीर्ति चौंकी. चौंकी ही नहीं, धक्क-सी रह गई. क्षण के छोटे से खंड में लगा था कि कहीं रज्जन ही न हो, पर थीं वे मिसेज मित्तल. रॉ-सिल्क की आसमानी साड़ी में अच्छी तरह कसी-कसाई और चुस्त. किसी विदेशी सेंट की बहुत भीनी खुशबू एक क्षण के लिए हवा में ठहर गई थी.
'अरे!' कीर्ति ने जल्दी से हाथ जोड़े, 'कहाँ जा रही हो?'
'भोपाल,' मिसेज मित्तल ने इतने सहज भाव में कहा जैसे उनका भोपाल जाना रोज-रोज की बात हो, 'और तुम!' उनकी आँखें बार-बार कंपार्टमेंट की ओर बढ़ते अपने कुली की ओर लगी हुई थीं.
'रज्जन आ रहा है.' मिसेज मित्तल के नए रूप वाले प्रभाव से मुक्त होने के लिए कीर्ति एक साँस में कह गई. वैसे पिछले कई घंटे से यह वाक्य उसे भीतर-भीतर तंग जरूर कर रहा था लेरकिन इस पल मिसेज मित्तल के अतिरिक्त वह और कोई बात नहीं सोच रही थी. बरसों बाद उन्हें इतना सिंगार-पटार किए कीर्ति देखे और खुद उनकी जबानी भोपाल जाने की बात सुने तो फिर अविश्वास की कहाँ गुंजाइश रह जाती है!
'अच्छा!' रज्जन की बात सुनकर एक पाँव से जमीं और दूसरे से उखड़ती हुई मिसेज मित्तल ने अपनी आँखों को और फैला लिया, पूछ रही थीं, 'इस गाड़ी से?'
'हाँ?'
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